एक राष्ट्र-एक चुनाव विचार और बहस

Rajasthan Khabre | Updated : Thursday, 12 Oct 2017 03:45:36
A nation-an election idea and debate

एक राष्ट्र-एक चुनाव पर एक बार फिर से बहस तेज हो गई है। चुनाव आयुक्त ओपी रावत के बयान के बाद इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है कि क्या अगले लोकसभा आम चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी कराए जाएंगे? हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा का कहना है कि आयोग का काम चुनावी प्रक्रिया और उसकी तैयारियों का है। इसके लिए कानून में बदलाव और इससे जुड़ी बातें तो संसद को तय करना है। ऐसे में यह बात भी गौर करने वाली है कि क्या सरकार अपने हिस्से में आने वाली जिम्मेदारियों को लेकर उतनी ही मुस्तैद है, जितना चुनाव आयोग।

 चुनाव आयोग ने कहा है कि वह साल भर के भीतर इस स्थिति में होगा कि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवा सके। आयोग के इस बयान से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस अभियान को बल मिला है, जिसमें उन्होंने कई बार कहा है कि हमें रोज-रोज चुनाव के चक्कर से बचने के लिए ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हो जाएं। इस पर कई मंत्रालयों से राय भी मांगी गई थी, वे भी इसके समर्थन में है। कुछ नागरिक संगठन तो दशकों से यह मांग करते रहे हैं, लेकिन उनकी बात अनसुनी ही की जाती रही है। अब उन्हें भी उम्मीद बंधी है। 

राजस्थान के मुख्यमंत्री और भारत के उपराष्ट्रपति रहे दिवंगत भैरोसिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति रहते हुए अनेक बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने की एक प्रकार से मुहिम शुरू की थी और उस समय इस पर बहस सी शुरू हो गई थी। उप प्रधानमंत्री रहते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने भी इसका समर्थन किया था। उस समय स्व. शेखावत की मुहिम को बल मिला था और अनेक गैर सरकारी संगठनों ने भी उनकी इस बात का तहेदिल से समर्थन किया था। शेखावत के निधन के बाद इस पर बहस बंद हो गई थी, अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान के बाद इस बहस ने फिर से जोर पकड़ लिया है।

यहां यह बता दें कि आजादी के बाद 1952 से 1967 तक केंद्र और राज्यों में कांग्रेस एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में मौजूद थी। ऐसे में केंद्र और राज्यों में चुनाव साथ-साथ होते रहे। बाद में 1967 में जब दूसरे राजनीतिक दल सत्ता में आए और संविद सरकारे बनी तो उनके सामने एक बड़ी चुनौती लगातार पांच साल तक सत्ता में बने रहने की थी। पिछले पांच दशक यानी 50 सालों में हमने देखा कि केंद्र और राज्यों की कई सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और गिर गई।

केंद्र में भी अस्सी के दशक में कई सरकारें आई और गई। अल्पमत वाली सरकार भी केंद्र में आई और गई। कोई सरकार डेढ़ वर्ष चली तो एक सरकार 13 दिन में ही गिर गई। 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निधन के बाद हुए चुनाव में उनके जेष्ठ पुत्र स्व. राजीव गांधी को दो तिहाई से ज्यादा सीटें मिली और स्पष्ट बहुमत मिला। लेकिन 1989 के बाद पिछले 25 वर्षों तक केंद्र में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और गठबंधन सरकारें बनी। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गए लोकसभा के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पहली बार लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला। इसके बावजूद अभी केंद्र में गठबंधन सरकार है। अब प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की बात कही है।

पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के मुद्दे पर इसके पक्षधरों और विरोधियों के अपने-अपने तर्क है, जहां इसके समर्थक कहते हैं कि इससे चुनाव कराने के खर्च में करीब-करीब 50 फीसदी तक की कमी आएगी, वहीं देश में विकास को भी रफ्तार मिलेगी। अभी देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव होते रहते हैं। ऐसे में सांसदों और विधायकों का ध्यान अपने कार्य या क्षेत्र से हटकर चुनावों की ओर चला जाता है। चुनावों के चलते आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य बाधित होने की भी बात कही जाती है। वहीं इस व्यवस्था के विरोधियों का तर्क है कि उम्मीद ज्यादा होगी। जहां पर राष्ट्रपति शासन होगा, वहां तो चुनाव कब होने चाहिए, इसका फैसला केंद्र सरकार पर निर्भर होगा, लेकिन जिस प्रदेश में कोई सरकार बहुमत के साथ शासन चला रही हो और उसका कार्यकाल छह माह से ज्यादा बाकी हो, वहां पर संवैधानिक समस्या पैदा हो सकती है, जिससे निपटना आसान नहीं होगा। मान लीजिए सारे देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव करा दिए जाएंगे, लेकिन यदि किसी राज्य में किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला या साल दो साल बाद वहां दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ पड़ी तो उस स्थिति में कैसे निपटा जाएगा। 

जब कोई भी दल या गठबंधन जानादेश लेकर पांच साल के लिए सत्ता में आया हो तो आप उससे पहले चुनाव कराने के लिए कैसे कह सकते हैं। सीधी सी बात है, ऐसे में लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का समर्थन करने वालों के सामने राजनीतिक चुनौती तो होगी ही संवैधानिक पेचों से भी उन्हें निपटना होगा। लोकसभा और विधानसभा दोनों सदनों के लिए यदि एक साथ चुनाव हुए तो क्षेत्रीय दलों के सामने एक साथ खड़ा हो सकता है। किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को वोट दे दिया तो उनके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है। हमारे देश में जितने भी राजनीतिक दल है मुख्य रूप से विचारधारा, क्षेत्र और भाषा पर आधारित है। सिर्फ दो दलों भाजपा और कांग्रेस ही राष्ट्रीय दल कह सकते हैं, बाकी सभी दल किसी न किसी क्षेत्र तक ही सीमित है। ऐसे में एक साथ चुनाव कराने के समर्थकों के लिए इन छोटे और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपने पक्ष में करना बहुत कठिन है।

 एक साथ चुनाव कराने का यह दायरा पंचायत और पालिकाओं तक बढ़ा दिया जाए तो ज्यादा व्यापक हो जाएगा। जहां तक बात इसके फायदे की है तो निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था पर खर्च का बोझ कम होगा, बल्कि राजनीतिक दलों को भी एक बार ही चुनाव प्रचार में खर्च करना होगा। साथ ही चुनाव के दौरान बार-बार लगने वाली आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में होने वाले अवरोधों से भी बचा जा सकेगा। वहीं राज्यों के लिए लोक लुभावन वादों के ऐलान से चुनाव को प्रभावित करने के आरोपों से भी केंद्र सरकार बच सकेगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि विधि आयोग ने अपनी 1999 में दी गई 170वीं रिपोर्ट में व्यापक राजनीतिक, संस्थागत और चुनावी सुधार के लिए एक साथ चुनाव कराने की सलाह दी थी, उस पर भी काम करने की जरूरत है। साथ ही चुनावी चंदा और दलीय राजनीति के तौर तरीकों पर ईमानदारी से काम करने की महती आवश्यकता है। इसे अमलीजामा पहनाने पर भाजपा को तात्कालिक फायदा जरूर मिलेगा। कांग्रेस का इस मामले में विरोध इस कारण है कि उसको तैयारी के लिए और वक्त चाहिए। लोकतंत्र में बदलाव की एक धीमी प्रक्रिया है।

 जो हमें परेशानियों से बचाती है, जो तेज बदलाव से पैदा होती है। इसलिए बेहतर होगा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बदलाव के लिए भी धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। वैसे एक साथ चुनाव थोड़ी बहुत परेशानियों के बावजूद लाभदायक हो सकता है। इसके लिए सभी दलों को इस मसले पर सहमति दिखानी होगी। आने वाला समय ही बताएगा कि आम सहमति कब बनती है।
 

 

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