क्या आप भी जानते है चंद्रशेखर की इस वीरगाथा के बारे में

Rajasthan Khabre | Updated : Monday, 04 Dec 2017 01:29:08 PM
Do you know about Chandrasekhar's heroic story

डेस्क। चंद्रशेखर कट्टर सनातन धर्मी ब्राहाण परिवार में पैदा हुए थे । इनके पिता नेक और धर्मनिष्ठ थे और उनमें अपने पांडित्य का कोई अहंकार नहीं था । वे बहुत स्वाभिमानी और दयालु प्रवृति के थे । घोर गरीबी में उन्होंने दिन बितायें थे और इसी कारण चंद्रशेखर की अच्छी शिक्षा नहीं हो पाई, लेकिन पढ़ना – लिखना उन्होंने गाँव के ही एक बुजुर्ग श्री मनोहरलाल त्रिवेदी से सिख लिया था, जो उन्हें घर पर निशुल्क पढ़ाते थे। बचपन से ही चंद्रशेखर में भारतमाता को स्वतंत्र कराने की भावना कूट कूटकर भरी हुई थी । इसी कारण उन्होंने स्वयं अपना नाम आजाद रख लिया था ।

एक बार दीवाली के समय पर चंद्रशेखर कहीं से रंगीन रोशनी करने वाली दियासलाई ले आए।  वह उस दियासलाई की एक-एक करके तीली जलाते औए फिर उसकी लौ को कुतूहल की दृष्टि से देखते।  उनके कई साथी उनके साथ खड़े होकर यह खेल देख रहे थे।  किसी की समझ में यह नहीं आ रहा था की तीली रोशनी कैसे करती है।

जब एक तीली जलाने पर इतनी रोशनी करती है, तब सारी तीलियाँ एक साथ जलाने पर कितनी रोशनी होगी ?’- चंद्रशेखर ने अपने मित्रों से कहा।  लेकिन इन सब तीलियों को एक साथ जलाए कौन ? इस प्रशन पर सभी मौन थे और एक अनजाना-सा डर सभी के मनो में व्याप्त था।  परन्तु चंद्रशेखर ने तो जैसे भय का नाम ही नहीं सुना था और उसी निर्भीकता के साथ वे बोले-“देखो ! मैं जलाकर दिखाता हूँ” ।

ऐसा कहकर चंद्रशेखर ने सारी तीलियाँ एक साथ जला दी।  तीलियाँ फक्क से जल उठी और तेज़ रोशनी हुई।  तीलियों के एक साथ जलने से चंद्रशेखर का हाथ भी जल गया, पर वह रोया नहीं।  उनके सहपाठियों को लगा की चंद्रशेखर अपने घाव का इलाज़ कराते वक़्त तो शायद रोए, परन्तु उन्हें आश्चर्ये हुआ जब चंद्रशेखर ने हँसते-हँसते, उसी निर्भीकता के साथ अपने हाथ की पट्टी कराई। चंद्रशेखर का बचपन निर्भीकता की ऐसी ही कहानियों से सरोबार रहा।

 

 

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