जांच-पड़ताल की गति पर सवाल!

Rajasthan Khabre | Updated : Friday, 08 Jun 2018 01:27:05 PM
Question at the speed of the investigation!
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 यह तय है कि एयरसेल-मैक्सिस सौदे में गड़बड़ी को लेकर ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय की ओर से की गई पूछताछ से पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम खुश नहीं होंगे और उनके पास अपने बचाव में कहने के लिए बहुत कुछ होगा, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जांच एजेंसियों को उनसे सवाल-जवाब करने का अधिकार नहीं। यह एक परिपाटी सी बनती जा रही है कि जैसे ही कोई जांच एजेंसी किसी मामले में किसी नेता से पूछताछ करने का उपक्रम करती है, ऐसे आरोप सामने आ जाते हैं कि राजनीतिक बदले की भावना के तहत काम किया जा रहा है।

 यही नेता अपने खिलाफ आरोप सामने आने पर ऐसे बयान देकर बहादुरी भी दिखाते हैं कि आखिर सरकार उनके खिलाफ जांच क्यों नहीं कराती? फिलहाल यह कहना कठिन है कि एयरसेल-मैक्सिस सौदे में नियम-कानूनों के कथित उल्लंघन के लिए चिदंबरम किस हद तक जिम्मेदार हैं, लेकिन यह ठीक नहीं कि इस मामले की जांच में जरूरत से ज्यादा समय लग रहा है। यह तो गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इस मामले की जांच जल्द समाप्त की जाए, अन्यथा शायद अभी तक चिदंबरम ईडी के सामने पेश भी नहीं हुए होते। ध्यान रहे कि ईडी को इसी मामले में उनके बेटे काॢत से भी पूछताछ करने में खासा समय लग गया था।

 आखिर नेताओं से पूछताछ करने के लिए जांच एजेंसियों को लंबा इंतजार क्यों करना पड़ता है? क्या आम आदमी को भी ईडी अथवा सीबीआई के समन की अनदेखी करने की सुविधा प्राप्त है? अगर नहीं तो फिर नेताओं के मामले में जांच एजेंसियां अपना काम समय पर पूरा क्यों नहीं कर पातीं? सवाल यह भी है कि नेताओं को अदालतों से बार-बार राहत क्यों मिलती रहती है? यदि ऐसी राहत आम लोगों को नहीं मिलती तो नेताओं को क्यों मिलनी चाहिए? पता नहीं कि एयरसेल-मैक्सिस सौदे की जांच कर रही सीबीआई और ईडी किसी नतीजे पर कब तक पहुंचेंगी, लेकिन इसे विस्मृत नहीं किया जा सकता कि चिदंबरम के घर इस सौदे की जांच से संबंधित सीबीआई की रपट का मसौदा बरामद हुआ था।

 यह वही रपट थी, जो सीबीआई ने सीलबंद लिफा$फे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि सीबीआई ने यह जांच शुरू कर दी कि उसकी रपट का मसौदा चिदंबरम के घर कैसे पहुंचा, क्योंकि कायदे से तो इस सवाल का जवाब पूर्व केंद्रीय मंत्री से ही मांगा जाना चाहिए। क्या ऐसा इसलिए नहीं किया गया, क्योंकि चिदंबरम केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रहे है? इससे तो यही साबित होता है कि जैसे नियम-कानून आम लोगों पर लागू होते हैं, वैसे खास लोगों और विशेषकर नेताओं पर नहीं लागू होते? नि:संदेह चिदंबरम इकलौते नेता नहीं हैं, जिनके खिलाफ सीबीआई अथवा ईडी या फिर ये दोनों एजेंसियां जांच कर रही हैं। 

उनके जैसे कई नेता हैं, जो जांच के दायरे में हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में यही दिख रहा है कि जांच मंथर गति से हो रही है। जब होना यह चाहिए कि नेताओं और अन्य प्रभावशाली लोगों के खिलाफ जांच में कहीं अधिक तेजी दिखाई जाए, तब इसके उलट देखने को मिल रहा है।
 

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