आरएसएस और प्रणब की सोच

Rajasthan Khabre | Updated : Monday, 11 Jun 2018 11:46:23 AM
RSS and Pranab's thinking
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पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का न्योता स्वीकार किया, तभी से उनके इस फैसले पर बराबर विवाद उठता रहा। स्वाभाविक ही सबसे ज्यादा असहज कांग्रेस पार्टी थी, दशकों तक जिसके प्रमुख नेताओं में मुखर्जी भी शामिल थे। कांग्रेस ने अपनी अप्रसन्नता जताने में कोई भी संकोच नहीं किया। यहां तक कि मुखर्जी की बेटी ने भी अपनी नाखुशी जाहिर की थी। प्रणब मुखर्जी की लंबी राजनीतिक या विचारधारात्मक पृष्ठभूमि को देखते हुए कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा और भी बहुत-से लोग हैरत में रहे होंगे। लेकिन मुखर्जी ने संघ का न्योता स्वीकार किया, तो इसके पीछे अपनी सोच को तिलांजलि देना नहीं, बल्कि संवाद की गुंजाइश बनाए रखने का दृष्टिकोण ही रहा होगा। 

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा भले न हो, पर जताया यही कि कोई कितने भी भिन्न या विरोधी विचार का क्यों न हो, संवाद हो सकता है। क्या आयोजकों का मकसद भी संवाद में अपना विश्वास जताना रहा होगा? जो हो, प्रणब मुखर्जी ने अपने संबोधन के लिए एक ऐसे विषय का चुनाव किया जिस पर कुछ समय से खासी बहस चलती रही है और जिसे संघ अपनी सोच का केंद्रभबदु मानता और बताता आया है। मुखर्जी ने अपने भाषण को राष्ट्रवाद और देशभक्ति जैसे मुद्दों पर केंद्रित करते हुए कहा कि धर्म के नजरिए से राष्ट्रवाद को देखना गलत होगा; राष्ट्रवाद किसी एक धर्म या भाषा से नहीं बंधा है; राष्ट्रीयता को धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के आधार पर परिभाषित करने का प्रयास हमारी राष्ट्रीय पहचान को धूमिल कर देगा। इसी सिलसिले में देशभक्ति को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि देश के प्रति समर्पण और संविधान में आस्था ही देशभक्ति है।

 इस तरह उन्होंने अपने पूरे भाषण में खुलेपन, विविधता, सहिष्णुता, साझी विरासत और साझी संस्कृति की वकालत की और अपनी इन बातों के साथ जवाहरलाल नेहरू के नजरिए की भी याद दिलाई। इस तरह उन्होंने संघ के मंच से वह सब कहा जो भहदुत्व में राष्ट्रवाद और देशभक्ति को सीमित करने की कोशिश करने वाले संघ को शायद ही रास आया हो। इसलिए हैरानी की बात नहीं कि प्रणब मुखर्जी के भाषण के बाद जहां संघ ने चुप्पी साध ली है, वहीं कांग्रेस के सुर बदल गए हैं।

अब कांग्रेस कह रही है कि पूर्व राष्ट्रपति ने संघ को आईना दिखाया है। संघ के लिए तसल्ली की बात यही हो सकती है कि प्रणब मुखर्जी ने संघ के संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि दी, और विजिटर बुक में उनके बारे में लिखा कि वे ‘भारत माता के एक महान सपूत’ थे। पर इस अवसरोचित कथन से मुखर्जी की सोच को लेकर किसी को गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। उनकी सोच तो वही है जो उन्होंने भाषण में रखी। इसमें संघ के लिए नसीहत भी देखी जा सकती है।

 पर यह भाषण केवल एक प्रकार की नहीं, बल्कि हर तरह की संकीर्णता और हर तरह की कट्टरता का निषेध करता है। इसमें परंपरा-बोध भी है, इतिहास की स्मृति भी और आधुनिक बोध भी। भारत की सभ्यता और संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित करने और उन्हें व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास भी। आखिर यह सब कहने की जरूरत प्रणब मुखर्जी को क्यों महसूस हुई होगी? वे भले संघ के मंच से बोले हों, उन्हें देश को यह बताना जरूरी क्यों लगा कि सही मायने में राष्ट्रवाद और देशभक्ति किसे कहते हैं। क्या इसलिए कि इनके अर्थ विकृत किए जा रहे हैं और पूर्व राष्ट्रपति इसके बारे में सबको आगाह करना चाहते थे!

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