ग्रामीण गरीबी उन्मूलन की योजनाएं ठप

Rajasthan Khabre | Updated : Monday, 17 Jul 2017 01:31:37
Rural Poverty Alleviation Plans

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को गांव के गरीबों की सुध लेने की फुर्सत नहीं है। मंत्रालय के अधीन चलाई जा रही योजनाएं कागजों पर दौड़ाई जा रही है। ग्रामीण युवाओं को कुशल बनाने की योजना ठप पड़ी है। इसकी जगह कृषि मंत्रालय ने आगे बढक़र कदम उठाया है। कृषि मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय जापानी एजेंसी से हाथ मिलाकर गरीबी उन्मूलन पर काम शुरू करेगा। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत गांव के बेरोजगारों को जहां रोजी रोजगार दिलाने का दायित्व है, वहीं उन्हें प्रशिक्षण देकर कुशल भी बनाना है। 

इस दिशा में सभी योजनाएं ठप पड़ गई है। समूची योजना कारगर निगरानी के अभाव में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। सालभर में प्रत्येक मजदूर को 100 दिनों का रोजगार देने की योजना 45 दिनों से आगे नहीं बढ़ पा रही है और न ही मनरेगा के मजदूरों को कुशल बनाने की योजना सिरे चढ़ पा रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की शुरुआत जोर-शोर से हुई, लेकिन योजना ठंडे बस्ते में है। परती व बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने, कृषि वानिकी और बागवानी जैसे कामों में लोगों को लगाने का काम भी नहीं हो पा रहा है। इसके विपरीत कृषि मंत्रालय ने एक योजना की शुरुआत की है अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के साथ संचालित होने जा रही है। कृषि मंत्रालय ने जापान इंटरनेशनल कोआपरेशन एजेंसी (जिका) के साथ मिलकर डेयरी विकास के मार्फत गरीबी उन्मूलन का फैसला लिया है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के उत्थान के लिए उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार मुहैया कराया जाएगा। ‘जिका’ मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत कौशल विकास के अनुरूप रोजगार सृजित किया जाएगा। कृषि क्षेत्रों में मंदी का दौर चल रहा है। फसलों की उपज के मुकाबले डेयरी उत्पादों की मांग में लगातार इजाफा हो रहा है। वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में 77 फीसदी परिवारों के पास किसी तरह के नियमित आय के साधन नहीं है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में औद्योगिकरण का गरीबी उन्मूलन में सकारात्मक योगदान नहीं मिला है। जबकि महाराष्ट्र व गुजरात के औद्योगिकरण ने इस मामले में बेहतर नतीजे दिए हैं। गांव के लोगों को नकदी देने के बजाए संसाधन मुहैया कराने पर जोर देना होगा।

 

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