शिवरात्रि भारत में पुनर्जागरण का पर्व है

Rajasthan Khabre | Updated : Tuesday, 13 Feb 2018 10:10:55 AM
Shivratri is the festival of Renaissance in India
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भारत के लम्बे इतिहास में धर्म, इतिहास, दर्शन और साहित्य चारों इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। धर्म दर्शन के मिथक, अवतारों और देवी देवताओं की लीलाओं से जुड़ कर पवित्र बने हैं और उन्होंने उन्हें विकृत भी किया है।

सभी ह्म्दिु देवताओं की त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश को आज भी भारी सम्मान के साथ अपने इष्ट देवता मानते हैं। इनके मन्दिरों, तीर्थ स्थलों और लीला भूमियों से पूरा देश अटा पटा पड़ा है। ब्रह्मा सृष्टि के जन्मदाता आदि देव है। राजस्थान के पुष्कर में इनका एक भव्य मन्दिर है, पर दक्षिण भारत सदैव से ही ब्रह्मावाद का गढ़ रहा है। विष्णु समाज के पालक माने जाते हैं और मध्य भारत का गंगा सिंध का मैदान विष्णु के विविध अवतारों (राम, कृष्ण, हनुमान, गणेश आदि) के मन्दिरों में प्रतिदिन पूजा अर्चना कर रहा है। कालान्तर मेें इनमें सरस्वती, दुर्गा, लक्ष्मी आदि देवियों और जुड़ गई है और विष्णु के उपासक वैष्णवों ने अनेक सम्प्रदाय बनाकर सगुण और निगुण भक्ति की परम्परायें डाली है।

शिव वे तीसरे देवता है जिनका आज भी हिमालय क्षेत्र में एक छत्र साम्राज्य है। शिव का शाब्दिक अर्थ ‘‘कल्याण’’ भले ही हो, पर इन्हें संहार का देवता भी माना जाता है। पतित पावनी गंगा इन्हीं की जटाओं से निकल कर पाकिस्तान से लेकर बंगलादेश तक बहती है। देश के सभी पवित्र धर्म नगर ऋषिकेश, हरिद्वार, मथुरा, प्रयाग, काशी, गंगा सागर इसी जान्हवी के किनारों पर बसे हैं।

उत्तराख्चाण्ड और हिमालय की देव भूमि तो यक्ष और किन्नरों का वह देवधाम है, जो जटा जूट धारी शिव की सेवा है। सांपों की माला पहनने वाले इस नागराज बम भोले शिव की अगणित पौराणिक कहानियां है। वे कण्ठ में जहर दबाकर जीने वाले ‘नीलकण्ठ’ है। कामदेव को अपनी तीसरी आंख खोलकर भस्म करने वाले शिव ‘प्रलय’ के देवता है। उनके ताण्डव, नृत्य और हास्य की मुद्राओं में भारत की कलायें मुखरित हुई है। वैष्णव और शैव पौराणिक गाथाओं में खूब लड़े भी हैं। पर्वतराज दक्ष की हिमालय पुत्री, सती और पार्वती से उनके विवाह और शिव बराताअें की कहानियां पूरा भारत चाव और संगीत के साथ सुनता है। रामचरण के राम शिव का ही धनुष तोडऩे पर परशुराम से क्षमा याचना करते हुए जनक सुता वैदेही से विवाह रचाते हैं।

शिव की इस प्रकार की महिमा दक्षिण भारत में देखने को नहीं मिलती। गोवा के एक प्राचीन मन्दिर में युवा शिवा का एक मूंछों वाला चित्र मिला है। दक्षिण की द्रविड़ जातियां श्री लंका तक हिमालय के इस देवता को अपना देव नहीं मानती। महाभारत युग में भी कृष्ण के वंशज अपने यदुकुल को दक्षिण भारत में नहीं फैला सके।

इन धर्म, सम्प्रदायों के जटिल इतिहास पर कोई भी रिसर्च कार्य नहीं हुआ है। पर ऐसा लगता है ब्रह्मा का दक्षिण में, विष्णु का उत्तर भारत में और शिव का पर्वतीय प्रदेशों की संस्कृतियों पर गहरा असर है। महर्षि दयानन्द ने शिवरात्रि के पर्व पर एक चूहे को शिव प्रतिमा का अनादर करते देख कर ही ‘मूर्ति पूजा’ के विरूद्ध आर्य समाज का धर्म सुधार अभियान चलाया था। हमें चाहिए कि इस ‘माययोलाजी’ में से मिथक निकाल कर, शिव के सत्यम् और सुन्दरम् स्वरूप को पहिचाने और एक नई भारतीयता की परिभाषा से अपनी भावी पीढिय़ों को परिचित करवायें। शिवरिात्र को भारत के पुनर्जागरण पर्व के रूप में मनाना इतिहास की सच्ची सेवा होगी।

- त्रिलोकी दास खण्डेलवाल
(ये लेखक के निजी विचार है)

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