परिवर्तन से बचने की प्रवृत्ति

Rajasthan Khabre | Updated : Saturday, 15 Jul 2017 11:25:36
Tendency to avoid change

वस्तु और सेवा कर लागू हो चुके एक पखवाड़ा होने जा रहा है, लेकिन देश के कुछ हिस्सों में उसका विरोध जारी है। कहीं-कहीं पर यह विरोध धरना-प्रदर्शन के रूप में भी हो रहा है। प्रश्न यह पैदा होता है कि जब जीएसटी एक दशक से प्रस्तावित था और बीते कुछ समय से यह स्पष्ट था कि उसका लागू होना तय है तो फिर उसके विरोध का क्या मतलब? दुनिया के अन्य समाज की तरह भारतीय समाज में परिवर्तन के प्रतिप्रतिकूल रहने की एक प्रवृत्ति है, लेकिन सिवाय उन्हीं मामलों में जिनमें खुद का स्वार्थ न हो।

 जब शुरू-शुरू में मोबाइल कंपनिया आईं तो उनकी ओर से ऐसे भी विज्ञापन आते थे कि एक दिन हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल होगा, चाहे वह मजदूर हो या किसान? तब लोग इसे मजाक समझते थे कि भला अनपढ़ लोग इसे कैसे इस्तेमाल कर पाएंगे? लोगों का यह मानना था कि मोबाइल कंपनियां बढ़-चढक़र विज्ञापन दे रही हैं। उनका यह भी सवाल था कि आखिर मोबाइल में अंग्रेजी में लिखे अंकों-शब्दों को पढक़र फोन करना या संदेश भेजना सबके लिए आसान कैसे हो जाएगा? चूंकि यह एक आवश्यकता थी इसलिए क्या पढ़ा-लिखे क्या अनपढ़, सभी मोबाइल का इस्तेमाल करने लगे। 

कभी-कभी हम यह पाते हैं कि किशोरवय के अनपढ़ मोबाइल के बारे में जितनी जानकारी रखते हैं उतनी पढ़े-लिखे नहीं रखते, क्योंकि यह उनकी रुचि और जरूरत की वस्तु हो गई है। उनके पास समय होता है तो वे मोबाइल पर गाने, फिल्म और समाचार आदि भी सुनते और देखते हैं। अगर जीएसटी को केवल स्वयं के उपयोग के लिए नहीं, भविष्य और देश के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो कुछ भी मुश्किल नहीं। 

 

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