नया भारत (न्यू इंडिया) निर्माण के लिए मतदाताओं का स्व-विवेक मतदान-कर्म अपेक्षित

Rajasthan Khabre | Updated : Thursday, 11 Oct 2018 03:03:39 PM
Voters' self-discretion for creation of new India
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भारत में मतदाताओं को मतदान-कर्म (वोट कास्टिंग) करना अपेक्षित है। देश का 18 वर्ष से ऊपर का हर नागरिक मतदाता (वोटर) है। अत: निर्वाचन आयोग द्वारा प्रसारित व अनुमोदित मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) में वोटर का नाम अंकित होना कानून जरूरी है। 2019 चुनाव का माहौल शुरू हो चुका है। राजनीतिक पार्टियां तैयारी में जुट गई है। वर्तमान में सत्ता में भाजपा (एनडीए) और विपक्ष में कांग्रेस (यूपीए) है। कांग्रेस द्वारा महागठबंधन का माहौल बनाया जा रहा है, जिसमेें भाजपा को सत्ता से बाहर कर नया प्रधानमंत्री बनाया जा सके।

वर्तमान में सशक्त व राष्ट्रोन्मुखी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं, जिनमें अनेक जनोपयोगी विशेषताएं तथा अपूर्व साहस, आत्मबल व दूरदर्शिता है तो मौलिक कल्याणकारी विकास योजनाओं को पहली बार शुरू कर दिखाने की सक्रियता व निष्काम कर्म साधना भी है। मोदी जी का व्यक्तित्व रचनात्मक संघर्ष की मिसाल है। जनहित की नूतन योजनाओं व मिशन को लागू करने में मोदी जी विश्व लीडरशिप के रूप में मुखरित हो चुके हैं।

वस्तुत: देश में मोदी जी की कार्यशैली से उन लोगों को नफरत हैं, जो कांग्रेस की विकृत कार्यशैली के पक्षधर है। कांग्रेस कार्यकाल में हुए घोटालों के जाल में जो लोग फंसे हुए हैं वे मोदी सरकार की स्वभावत: विरोधी है। पीडि़त लोगों के लिए कांग्रेस ही ढाल है। वर्तमान में मतदाताओं को लाभ-हानि पर विचार करके निर्णय करना है कि उन्हें वोट किस पार्टी के पक्ष में देना है?

देश के समक्ष लाभ-हानि का स्वरूप इस प्रकार है-
1.क्या विकास (समग्र विकास) जो चालू हुआ है उसे आगे बढ़ाना है?
2. क्या देश को एक पार्टी बहुमत को त्याग कर पुन: गठबंधन सरकार पर लौटना है?
3. क्या आरक्षण चालू रखना है अथवा आर्थिक आधार पर आरक्षण का पुनर्गठन करना है?
4. क्या वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन कर नई शिक्षा प्रणाली लागू करनी है जिसमें शिक्षित-रोजगार की गारंटी हो?
5. क्या देश में लागू हो चुका संशोधित जीएसटी में और संशोधन की जरूरत है? यदि हां तो वह क्या परिवर्तन है?
6. क्या कालेधन की दो नंबर की अर्थव्यवस्था से देश को आजाद रखना है या पुन: चालू करना है?
7. क्या सार्वजनिक वितरण प्रणाली को शुद्ध, विस्तृत व कालाबाजारी से मुक्त बनाना है, वे नए संशोधन क्या चाहते हैं?
8. घरेलू व्यापार को इन्सपेक्टरराज से मुक्त कर दिया गया है, और क्या सहायता व सुधार चाहते हैं?
9. आर्थिक विनियोग (विदेशी विनियोगकर्ता) पर क्या विचार रखते हैं?
10. नौकरशाही में पनप रहे भ्रष्टाचार पर क्या सख्त कदम बतलाना चाहते हैं?
11. मानव अधिकार के संरक्षण हेतु क्या-क्या सुझाव देना चाहते हैं?
12. देश में चालू की गई (चल रही) विभिन्न नि:शुल्क जनकल्याण सेवाएं और कितना विस्तार चाहते हैं या कोई नया संशोधन पेश करना चाहते हैं?
13. महंगाई का ज्वलंत मुद्दा कैसे नियंत्रण में आ सकता है? आप व्यावहारिक तरीका खोजिए और बतलाइए?
14. देश में हो रही मिलावट प्रदूषण व माफिया कार्यों पर कैसे नियंत्रण पाया जाए? योजना बनाइए और दीजिए।

वर्तमान परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में मतदाताओं के तीन वर्ग हमारे सामने हैं-
1. वे मतदाता जो लाभार्थी है।
2. वे मतदाता जो अपराध-बोध से पीडि़त है।
3. वे मतदाता जो पार्टी से अधिक देश को वरीयता देना चाहते हैं क्योंकि वे पार्टी बंधन में नहीं है।

वर्तमान में राजनीति दृष्टि से देश दो धु्रवीकरण में चल रहा है- (1) एनडीए (नेशनल डेमोक्रेटिक अलाइन्स), (2) यूपीए (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलाइन्स)।
देश की केंद्र सरकार के निर्माण के लिए लोकसभा चुनाव (2019) में मतदान करना होगा। राज्यों में राज्य सरकार के निर्माण के लिए संबंधित राज्य की जनता मतदान कर पाएगी। जैसे 2018 में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व मिजोरम में चुनाव होने जा रहे हैं।

देश का हित सर्वोपरि है और उसके लिए नॉरम्स इस प्रकार हो सकते हैं-
(अ)  केंद्र सरकार में स्थायित्व होना चाहिए।
(ब)  राज्य सरकार और केंद्र सरकार में समान राजनीतिक पार्टी की सरकारें होने से संबंध मजबूत बने रहते हैं तथा विकास योजनाएं लागू करने में सहकार प्राप्त होता रहता है। आर्थिक संकट भी खड़ा नहीं होता है।
(स) विदेशों से देश के संबंध (अंतरराष्ट्रीय संबंध) मधुर व प्रगाढ़ कैसे बने रह सकते हैं?

विशेष संदर्भ यह समझाने का है कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष का निर्माण बहुमत से होता है। सवाल यह है कि एक पार्टी का बहुमत हो अथवा गठबंधन पार्टियों का बहुमत हो?
विपक्ष में बैठने वाली पार्टियों का नैतिक कर्तव्य है कि वे ‘बहुमत’ का पूर्ण सम्मान करे और जनप्रतिनिधि अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र में जनसेवा में सक्रिय रहें।
मतदाताओं को सत्ता शासन की योजनाओं का पूर्ण लाभ पहुंचावे। जब कोई जनप्रतिनिधि लोकतांत्रिक संस्था में सीट ग्रहण कर लेता है तो वह सह भागीदार बन जाता है। क्षेत्र के मतदाताओं की समस्याओं का निराकरण करना या कराना अभीष्ट होता है।
लोकतंत्र में राजनीति व कूटनीति महत्वपूर्ण है। बिना राजनीतिक संगठनों के लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण नहीं हो सकता है।

ऐसी स्थिति में राजनीतिक शैली में तीन मोड परिलक्षित होते हैं-
(क)  चुनाव प्रसार शैली व चुनाव घोषणा पत्र का प्रसारण।
(ख)  चुनावोपरान्त संबंधित लोकतांंत्रिक संस्था में प्रवेश व शिष्टाचार (संसदीय आचरण) अनुपालन।
(ग) जन समस्याओं व विकास योजनाओं का कन्सपेशन सुस्पष्ट होना व रचनात्मक सहभागीदारी निभाना।
(आवश्यक समझें तो संविधान का स्वाध्याय भी कर लिया जाए।)

आजकल चिंता का विषय यह बन गया है कि  राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन अपनी विचार धाराओं से किनारा कर बैठी है। अत: सिद्धांत गौण व व्यवहार प्रमुख हो गया है।
आजकल चिंता का विषय यह है कि जेब में जो भी पैसा आता है वह तुरंत ही खर्च हो जाता है। क्योंकि भारतीय मुद्रा की क्रयशक्ति कम होती चली जा रही है। अधिक मुद्रा देने पर भी कम मात्रा में वस्तु प्राप्त हो पाती है?

आजकल चिंता का विषय यह है कि महंगाई की मार ने उपभोक्ताओं की कमर तोड़ दी है। मंदी का दौर शुरू हो गया है, फलत: मजदूरी बढ़ गई किन्तु मुनाफा कम हो गया। अत: मिलावट व धोखाधड़ी चालू हो रखी है। आजकल चिंता का विषय यह है कि पानी, बिजली, टेलीफोन आदि के बिलों में अनेक कालम (विभिन्न चार्जेज) जुड़ गए हैं जिससे अभोग्य चार्जों के भार से बिल राशि बढक़र आने लगी है। इसके अतिरिक्त न्यूनतम शुल्क के नाम पर बिना उपभोग बिल राशि का नियोजन किया जा रहा है। आजकल इन्कम टैक्स रिटर्नस की पूर्ति के लिए अलग से सीए का खर्चा बढ़ गया है। आजकल प्रचार स्वच्छ भारत का हो रहा है और अस्वच्छता बरकरार है। बैंक भी जनहितों के लिए सफल नहीं हो पा रहे हैं। झूठी कंपनियां बन गई और धन लूट ले गई। सदाचार का अंत होकर अपचार बढ़ रहा है धार्मिक उन्माद बढ़ रहा है। विभिन्न सुधार कानून बन तो गए किन्तु लागू नहीं हो पा रहे हैं। विफल हो रहे हैं। स्वार्थ में आदमी अंधा हो रहा है और परमार्थ से किनारा कर बैठा है। लोक-लाज समाप्त हो गई है। आचरण व खानपान दूषित होता चला जा रहा है। नैतिकता पर से भरोसा उठ गया है। ईश्वर तक का नाम ही रह गया किन्तु भरोसा डगमगा गया।

सारांशत: मतदाताओं के लिए स्व विवेक से मतदान करना ही अपेक्षित है।
(ये लेखक के निजी विचार है) 

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