मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए करें इस स्त्रोत को पाठ

Rajasthan Khabre | Updated : Thursday, 22 Nov 2018 11:05:51 AM
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डेस्क। जैसा कि हम सभी जानते हैं की मां लक्ष्मी धन की देवी को कहा जाता है जो भी व्यक्ति सच्चे मन से धन की देवी मां लक्ष्मी का व्रत, पूजा करते है। उसकी सभी मनोकामना मां जल्द ही पूर्ण कर देती है। मां लक्ष्मी अपने की भक्तों की धन से संबंधीत सभी समस्याए दूर करती है। धन और यश की प्राप्ती के लिए मां लक्ष्मी की उपासना की जाती है। तो आज हम आपको बताने जा रहे है कुछ एसे उपाय जिनको करने मात्र से आपके पास धन की कभी भी कमी नहीं रहेगी। तो आईए जानते है...


मां लक्ष्मी की पूजा का उत्तम समय होता है मध्य रात्रि होता है। हमको मां लक्ष्मी की उपासना मध्य रात्री के समय करनी चाहिए। और मां लक्ष्मी के लिए श्रीसूक्त का पाठ करना चाहिए।

मां लक्ष्मी की पूजा करते समय हमको मां लक्ष्मी पर गुलाबी पुष्प, विशेषकर कमल चढ़ाना सर्वोत्तम रहता है। इसलिए हमें पूजा करते समय कमल या फिर लाल गुलाब का फूल अवश्य चढाना चाहिए।

श्रीसूक्त का पाठ

ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।।
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।

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