क्या शनि की साढ़े साती शुरू हो गई है? शनि देव को प्रसन्न करने के लिए 'लाल किताब' के उपाय करें

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नौ ग्रहों में शनि देव ही ऐसे देवता हैं जो इंसान को उसके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं। अगर शनि देव किसी इंसान से खुश होते हैं तो उसे दिन-रात तरक्की देते हैं। शनि इंसान को कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने में मदद करते हैं। अगर कोई इंसान बुरे काम करता है तो उसे शनि देव का गुस्सा झेलना पड़ता है। अगर कोई इंसान शनि देव की साढ़े साती के असर में है तो शनि देव उस इंसान को ज़िंदगी की सबसे बड़ी सीख देते हैं। हालांकि, लाल किताब में साढ़े साती के दौरान शनि देव से होने वाली परेशानियों को कम करने के कई उपाय बताए गए हैं। आइए पंडित राकेश झा से जानते हैं कि शनि साढ़े साती के असर को कम करने के लिए क्या उपाय करने चाहिए।

शनि साढ़े साती के उपाय

पंडित राकेश झा सलाह देते हैं कि शनि देव को खुश करने के लिए साढ़े साती के दौरान कम से कम 40 दिनों तक हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। पहले कोई संकल्प लें और फिर हनुमान चालीसा का पाठ शुरू करें।

साढ़े साती के दौरान पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है। ऐसे में पीपल के पेड़ पर कच्चा दूध चढ़ाएं और कम से कम 40 दिनों तक पानी दें।

शनिवार को उड़द दाल की खिचड़ी बनाकर शनि महाराज को चढ़ाएं और ज़रूरतमंद लोगों को खिलाएं। यह उपाय कम से कम 7 शनिवार तक करें।

इसके अलावा, शनिवार को थोड़ा कच्चा दूध पानी में मिलाकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाएं। एक सूती धागा लें और पीपल के पेड़ की परिक्रमा करते हुए उसे लपेट लें।

शनिवार और मंगलवार को तुलसी के पत्ते पर 'राम' नाम लिखकर हनुमानजी को चढ़ाएं।

साथ ही, शनि साढ़े साती के दौरान शनि देव को खुश करने के लिए शनि मंत्रों का जाप करें।

आप महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी कर सकते हैं। इससे भी शनि साढ़े साती से राहत मिलती है। शनि देव भगवान शिव के भक्त हैं।

जब शनि साढ़े साती चल रही हो, तो गलती से भी मांस खाने या शराब पीने से बचना चाहिए। ऐसा करने से शनि देव के बुरे असर और बढ़ सकते हैं।

शनि साढ़े साती क्या है?

ज्योतिष के अनुसार, शनि की साढ़े साती साढ़े सात साल तक रहती है। इस दौरान व्यक्ति को मानसिक तनाव, सेहत से जुड़ी परेशानियां और रिश्तों में तनाव का सामना करना पड़ता है। साढ़े साती व्यक्ति के जीवन में बड़े बदलाव लाती है। शनि की साढ़े साती के तीन चरण होते हैं: पहला, दूसरा और तीसरा। पहले चरण में मानसिक अशांति, अनचाहा प्रवास और यात्रा होती है। खर्चे बढ़ जाते हैं। दूसरे चरण में व्यक्ति को पैसे की दिक्कतें, सेहत में उतार-चढ़ाव और बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। तीसरे चरण में झगड़ों से राहत मिलती है, लेकिन परिवार के सदस्यों के साथ बहस होने की संभावना रहती है।