Nirjala Ekadashi 2026: निर्जला एकादशी की शाम को इस दिशा में जलाएं दीपक, धन में होगी अपेक्षित वृद्धि
- byvarsha
- 25 Jun, 2026
आज ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एक व्रत से साल भर की सभी एकादशी व्रतों का पुण्य मिल जाता है। इसका महत्व धार्मिक शास्त्रों, पुराणों और महाभारत में बताया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार, पांडु पुत्र भीम ने सभी एकादशी व्रतों का पुण्य पाने की आशा में वेद व्यास के बताए अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत किया था। इसी वजह से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। भक्त इस दिन कठोर व्रत रखते हैं और ब्रह्मांड के पालनहार भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजा और व्रत करने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। पूजा और व्रत के साथ-साथ इस दिन कुछ खास उपाय भी किए जाते हैं, जिनमें दीपक जलाने की प्रथा भी शामिल है। माना जाता है कि निर्जला एकादशी के दिन शाम को घर की इस दिशा में दीपक जलाने से लाभ होता है। जानें किस दिशा में जलाएं दीया
निर्जला एकादशी की शाम को इस दिशा में दीया जलाएं
मुख्य दरवाज़ा
निर्जला एकादशी की शाम को मुख्य दरवाज़े पर (घर से बाहर निकलते समय) चौखट के दाईं ओर दीया जलाएं। दीये का मुंह दक्षिण दिशा में रखें। ऐसा करने से घर में नेगेटिव एनर्जी नहीं आएगी।
लक्ष्मी मंदिर
अगर हो सके, तो आज लक्ष्मी मंदिर ज़रूर जाएं और देवी के चरणों में दीया जलाएं।
पीपल के पेड़ के नीचे
आज शाम पीपल के पेड़ के नीचे दीया ज़रूर जलाएं। पीपल को बहुत पवित्र पेड़ माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, पीपल के पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवता निवास करते हैं। माना जाता है कि इस पेड़ के नीचे दीया जलाने से बड़ी से बड़ी मुसीबत भी टल जाती है।
उत्तर-पूर्व दिशा
आज शाम अपने घर या पूजा की जगह के उत्तर-पूर्व कोने में दीया जलाएं। ऐसा करने से देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। उनके आशीर्वाद से आपके घर में सुख, समृद्धि और धन का वास होगा।
निर्जला एकादशी की कहानी क्या है?
निर्जला एकादशी का महत्व महाभारत में पांडव भीमसेन से जुड़ा है। धार्मिक कहानियों के अनुसार, भीम अपनी असाधारण ताकत और ज़्यादा खाने की आदत के लिए मशहूर थे। उन्हें महीने में दो बार आने वाली एकादशी का व्रत रखना मुश्किल लगता था। इसलिए, उन्हें चिंता थी कि उन्हें एकादशी व्रत का पुण्य नहीं मिलेगा। तब उन्होंने महर्षि वेद व्यास से सलाह ली। वेद व्यास ने उन्हें साल में सिर्फ़ एक बार निर्जला एकादशी का कठोर व्रत रखने की सलाह दी, जिसमें उस दिन खाना और पानी दोनों से परहेज़ करना था। उन्होंने समझाया कि इस एक व्रत को रखने से सभी एकादशियों का पुण्य मिल सकता है। भीम ने ऋषि की सलाह मानी और व्रत को सफलतापूर्वक पूरा किया। तब से, यह एकादशी उनके नाम से जानी जाने लगी। निर्जला एकादशी को कई नामों से भी जाना जाता है। भीमसेनी एकादशी, भीम एकादशी, पांडव एकादशी।






