Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों के रहस्य आज भी हैं अनसुलझे, जानकर आप भी रह जाएंगे....

इंटरनेट डेस्क। जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई यानी के कल से शुरू होने जा रही है। इसके लिए तैयारिया पूरी हो चुकी है। ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर न केवल आस्था का एक बड़ा केंद्र है, बल्कि विज्ञान और इंसानी सोच के लिए आज भी एक अनसुलझी पहेली है। यहां भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियां विराजमान हैं। इन मूर्तियों से जुड़े कई ऐसे रहस्य हैं, जिन्हें जानकर आधुनिक विज्ञान भी हैरान रह जाता है।

मूर्ति के अंदर धड़कता है भगवान का दिल
जब हर 12 या 19 साल में भगवान की मूर्तियां बदली जाती हैं, तो पुरानी मूर्ति के भीतर से एक गुप्त ब्रह्म पदार्थ निकालकर नई मूर्ति में डाला जाता है। सदियों से यह काम करने वाले पुजारियों का मानना है कि यह साक्षात भगवान कृष्ण का धड़कता हुआ दिल है, जो आज भी धड़कता है।

आंखों पर बांधनी पड़ती हैं पट्टी 
जब ब्रह्म पदार्थ को एक मूर्ति से दूसरी मूर्ति में ट्रांसफर किया जाता है, तो उस रात पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है। यह काम करने वाले पुजारी की आंखों पर रेशमी पट्टी बांध दी जाती है और हाथों में मोटे दस्ताने पहनाए जाते हैं। माना जाता है कि अगर किसी ने इस पदार्थ को देख लिया, तो उसकी जान भी जा सकती है।

बिना हाथ-पैर की मूर्तियां

जगन्नाथ मंदिर में मूर्तियां अधूरी हैं, भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियों के न तो पंजे बने हैं, न ही पैर। मान्यता है कि जब देव-शिल्पी भगवान विश्वकर्मा बंद कमरे में इन्हें बना रहे थे, तब राजा की रानी ने उत्सुकतावश दरवाजा खोल दिया। शर्त टूटने के कारण विश्वकर्मा जी मूर्तियों को उसी आधे-अधूरे रूप में छोड़कर गायब हो गए।

भगवान के रंग के हिसाब से चुना जाता है पेड़
मूर्तियों को बनाने के लिए नीम के पेड़ के रंग का विशेष ध्यान रखा जाता है। दरअसल, भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला है, इसलिए उनकी मूर्ति के लिए सांवले या गहरे रंग के नीम का पेड़ ढूंढा जाता है। भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का रंग गोरा है, इसलिए उनकी मूर्तियों के लिए हल्के या सफेद रंग के नीम का पेड़ खोजा जाता है।

pc- jagran